प्रणव कुमार अभय

नई दिल्ली, 6 जुलाई। विट्ठल भाई पटेल भवन में डिप्टी स्पीकर हाल में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 126वीं जयंती की पूर्व संध्या पर भारतीय जनसंघ की ओर से एक आयोजन किया गया। आयोजन की अध्यक्षता जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री भारत भूषण पांडे जी ने की। इस मौके पर विशिष्ट अतिथि के रूप में सुप्रसिद्ध विचारक प्रोफेसर रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक महान राष्ट्रभक्त और अद्वितीय प्रतिभावान थे। भारतीय जनसंघ की स्थापना की प्रेरणा और पहल मुख्यतः डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की ही रही।

उन्होंने कहा कि डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि यह जो आधुनिक किस्म की पार्टियां हैं वह प्रतिस्पर्धी को सहन नहीं करती है और इनको यानी जवाहरलाल नेहरू जी को हिंदू शक्तियों से डर है इसलिए स्वयं हिंदू शक्तियों की भी प्रतिनिधि कोई एक पार्टी बनाना बहुत आवश्यक है। इस प्रकार जनसंघ के निर्माण की मुख्य प्रेरणा और पहला तथा उसके पक्ष में तर्क सर्वप्रथम डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही दिए थे। गुरु गोलवलकर जी को ये तर्क सही लगे और उन्होंने कहा कि ठीक है आप पार्टी बनायें ।

तो उन्होंने अपने कुछ स्वयंसेवक दिए अटल बिहारी वाजपेई, दीनदयाल उपाध्याय , बलराज मधोक और नानाजी देशमुख आदि को और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय पार्टी गठित हो गई ।इसमें शुरू में बहुत ही उच्च कोटि के विद्वानों और राष्ट्रभक्तों को शामिल किया गया। अटल जी ,डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव का काम करते थे । इस प्रकार जनसंघ की स्थापना में निर्णायक भूमिका डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की है जो इतिहास ,राजनीति और सनातन धर्म के आधारों के बहुत बड़े ज्ञाता थे।

इसीलिए जनसंघ का लक्ष्य अखंड भारत ,गोवंश की सम्पूर्ण रक्षा और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने तथा भारत के सभी समुदायों में राष्ट्रीय भावना का उन्मेष करना था ।

 

संस्कृति वस्तुतः धर्म के सिवाय और कुछ नहीं होती। धर्म ही संस्कृति है

जिसे अंग्रेजी में कल्चर कहते हैं वह तो बहुत मामूली चीज है ।वह छोटे-छोटे भेद के द्वारा अलग संस्कृति कहने लगते हैं। अलग कल्चर कहने लगते हैं।

लेकिन सनातन धर्म की संस्कृति संपूर्ण राष्ट्र की एक है । इसलिए धर्म ही जनसंघ का प्रयोजन था। धर्म की स्थापना और धर्म मय राज्य की स्थापना जनसंघ का मूल प्रयोजन था।

बाद में 1980 में उसके एक प्रमुख अंश ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। शेष लोग उससे अलग मूल जनसंघ चला रहे हैं। इन दिनों विश्व की जैसे स्थिति है उसमें अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का राजनीति के स्वरूप निर्धारण में बहुत महत्व है। तो पहले जो समाजवादी दौर था उसके कारण कांग्रेस और उसके विरोधी दल सभी समाजवाद की बात करते थे। समाजवाद समाजवाद चारों तरफ था।

सोवियत संघ का विघटन हो गया और समाजवाद दुनिया में बहुत ही भयंकर मतवाद के रूप में बदनाम हो चुका है क्योंकि उसने बहुत बर्बरता की है अतः अब समाजवाद का कांग्रेस का और अपने को समाजवादी कहने वाली किसी भी धारा का कोई भविष्य नहीं है ।

 

कांग्रेस लगातार बदलती रही है और राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी ने उसे ईसाई मिशनरियों की सेवक पार्टी बनाने की पहल की। राहुल वही लक्ष्य आगे बढ़ा रहे हैं। मैं ने 2014 में ही आस्था चैनल पर अपने प्रसारण में भी कहा था और लेख में भी लिखा था कि भारतीय समाज बहुत परिपक्व समाज है और उसने धीरज से कांग्रेस को काफी अवसर दिए और जब कांग्रेस सोनिया गांधी के समय हिंदू विरोधी हो गई तो उसने उसे बदलने का निश्चय किया ।

नरेंद्र मोदी केवल किसी संगठन के बल पर नहीं आए हैं। वह देवताओं के आशीर्वाद और संत महात्माओं के आशीर्वाद तथा धर्म प्राण हिंदुओं की योजना से आए हैं, इच्छा से आए हैं, प्रयास से आए हैं । हिंदुत्व का यह परिवेश कम से कम 50 वर्ष रहेगा और अगर हिंदू दलों ने अच्छा कार्य किया तो सदा के लिए भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में पुनः प्रतिष्ठित हो जाएगा ।

भारतीय जनता पार्टी का विकल्प भी कोई हिंदू पार्टी ही बन सकेगी जो सनातन धर्म से प्रेरित हो, जो भारत के मर्म को जानती हो और भारत के सत्व को आगे बढ़ाने वाली हो।

जनसंघ पहले से ही इसी के लिए गठित एक पार्टी है। इसलिए जनसंघ के सामने अवसर ही अवसर है।

परंतु केवल विचारों से कोई पार्टी नहीं आगे बढ़ती। पुरुषार्थ और तप करना होगा। राजनीतिक पुरुषार्थ और लक्ष्य प्राप्ति के लिए तपस्या के द्वारा ही संगठन आगे बढ़ते हैं। यदि अगले 10 वर्षों तक जनसंघ ने पुरुषार्थ और तप किया तो चहुं ओर विजय ही विजय है। भारतीय जनता पार्टी के विकल्प के रूप में वह राष्ट्र को मान्य हो सकेगी। पुरुषार्थ और तप करना आपके हाथ में है।

By नवप्रभा टाइम्स

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