प्रणव कुमार दुबे
नेपाल में हाल के दिनों में आई अप्रत्याशित और विनाशकारी बाढ़ ने पूरे देश में तबाही का ऐसा खौफनाक मंजर पैदा कर दिया है, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है। भारी बारिश, भूस्खलन और उफनती नदियों ने पल भर में दर्जनों गांवों और कस्बों का नामोनिशान मिटा दिया है। बाढ़ का पानी अब भले ही धीरे-धीरे उतरने लगा है, लेकिन अपने पीछे वह मौत और बर्बादी की ऐसी भयावह तस्वीर छोड़ गया है, जिसने नेपाल की पूरी प्रशासनिक और स्वास्थ्य व्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है। मलबे के ढेरों और कीचड़ से सने रास्तों के बीच से लगातार निकल रहे शवों ने एक ऐसा राष्ट्रीय संकट खड़ा कर दिया है, जिससे निपटने में सरकार और तमाम एजेंसियां खुद को पूरी तरह से असहाय और लाचार महसूस कर रही हैं। यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक ऐसी मानवीय त्रासदी बन चुकी है जिसने पूरे देश को गहरे शोक और मातम में डुबो दिया है।
इस जलजले का सबसे खौफनाक और चिंताजनक पहलू यह है कि जान गंवाने वालों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि नेपाल का संपूर्ण स्वास्थ्य ढांचा इसके आगे पूरी तरह से बौना साबित हो रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अत्यंत चौंकाने वाले और डरावने आंकड़ों के अनुसार, पूरे नेपाल देश के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों के शवगृहों को मिला लिया जाए, तो उनमें अधिकतम 350 शवों को ही सुरक्षित रखने की क्षमता है। इसके बिल्कुल विपरीत, त्रासदी की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल अकेले चितवन जिले और उसके आसपास के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से ही अब तक 321 से अधिक शव बरामद किए जा चुके हैं। पूरे देश से आ रहे शवों के इस अंतहीन सिलसिले के कारण अस्पतालों के शवगृह पूरी तरह से भर चुके हैं। नौबत यहां तक आ गई है कि अस्पतालों के गलियारों, कमरों और खुले परिसरों में शवों को रखना पड़ रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र में महामारी और भयंकर संक्रमण फैलने का गंभीर अंदेशा पैदा हो गया है।
अस्पतालों में एक भी शव रखने की जगह न बचने और संक्रमण के बढ़ते खतरे को देखते हुए, नेपाल के स्थानीय प्रशासन को एक ऐसा कठोर, अकल्पनीय और विचलित कर देने वाला कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है, जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। राजधानी काठमांडू के बाहरी इलाके में स्थित गोकर्ण के शांत, हरे-भरे और घने जंगलों को अब मजबूरीवश एक विशाल अस्थायी कब्रिस्तान में तब्दील कर दिया गया है। जिन अज्ञात और लावारिस शवों की शिनाख्त नहीं हो पा रही है, उन्हें अस्पतालों से ट्रकों में भरकर सीधे इन जंगलों में लाया जा रहा है और सामूहिक रूप से दफनाया जा रहा है। गोकर्ण के इन जंगलों में अब प्राकृतिक शांति की जगह केवल एंबुलेंस के सायरन, मशीनों की गड़गड़ाहट और मिट्टी में दफ्न होती गुमनाम जिंदगियों का एक खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ है, जो इस महाविनाश की गहराई को बयां कर रहा है।
इस अत्यंत जोखिम भरे, संवेदनशील और हृदयविदारक दायित्व को पूरा करने के लिए नेपाल के विशेष सुरक्षाबलों और आपदा प्रबंधन टीमों को तैनात किया गया है। शवों के बहुत तेजी से सड़ने और उनसे उठने वाली दुर्गंध के साथ-साथ जलजनित तथा संक्रामक बीमारियों के भारी जोखिम से बचने के लिए, सभी तैनात जवान सिर से लेकर पैर तक फुल पीपीई किट पहनकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं। भारी बारिश के बाद फैली दलदल जैसी कीचड़, दुर्गम रास्तों और विपरीत मौसम की मार के बावजूद, ये जवान अपनी जान की परवाह किए बिना दिन-रात जंगलों में कब्रें खोदने और शवों को दफनाने की प्रक्रिया में जुटे हुए हैं। उनके लिए यह केवल एक ड्यूटी नहीं है, बल्कि एक ऐसा भारी मानसिक और शारीरिक बोझ है, जिसे वे इस त्रासदी के बीच ढोने को मजबूर हैं ताकि मृतकों को कम से कम मिट्टी नसीब हो सके।
इस भीषण हाहाकार के बीच, जो बेबस परिवार अपने लापता सदस्यों की तलाश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, उनकी आखिरी उम्मीद के लिए प्रशासन और फॉरेंसिक विशेषज्ञ बेहद सतर्कता के साथ वैज्ञानिक तरीकों का सहारा ले रहे हैं। गोकर्ण के जंगलों में दफनाए जाने वाले प्रत्येक अज्ञात शव के बॉडी बैग पर परमानेंट मार्कर की मदद से एक विशेष पहचान संख्या स्पष्ट अक्षरों में दर्ज की जा रही है। सबसे अहम बात यह है कि किसी भी शव को मिट्टी के सुपुर्द करने से ठीक पहले उसका DNA सैंपल अनिवार्य रूप से लिया जा रहा है। इन सैंपल्स को फॉरेंसिक लेबोरेटरी में एक विस्तृत डेटाबेस बनाकर बेहद सुरक्षित तरीके से संरक्षित किया जा रहा है, ताकि भविष्य में जब कोई रोता-बिलखता परिवार अपने अपनों को ढूंढता हुआ आए, तो डीएनए मिलान के जरिए उन्हें यह बताया जा सके कि उनके परिजन का अंतिम संस्कार कहां और किस नंबर के तहत किया गया है।
जमीनी स्तर पर तेजी से बिगड़ते हालात, अस्पतालों में शवों के सड़ने से पैदा हुए महासंकट और मर्चुरी की सीमित क्षमता को देखते हुए नेपाल सरकार को भी तुरंत हरकत में आना पड़ा। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कैबिनेट की एक अत्यंत विशेष और आपातकालीन बैठक बुलाई गई, जिसमें हालातों की गंभीरता का आकलन करते हुए ‘लावारिस शव प्रबंधन’ से जुड़े दशकों पुराने कानूनी नियमों में रातों-रात बड़े और ऐतिहासिक बदलाव किए गए। पुराने नियमों के तहत, पुलिस और प्रशासन को किसी भी लावारिस शव का अंतिम संस्कार करने से पहले उसकी पहचान के लिए कई दिनों तक अनिवार्य रूप से इंतजार करना पड़ता था। लेकिन इस अभूतपूर्व राष्ट्रीय संकट को देखते हुए नए नियमों के तहत प्रशासन को यह कानूनी छूट दे दी गई है कि वे डीएनए सैंपलिंग, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी जैसी जरूरी वैज्ञानिक औपचारिकताएं पूरी करने के तुरंत बाद बिना कोई समय गंवाए शवों को दफना सकते हैं, ताकि देश को किसी नई स्वास्थ्य महामारी से बचाया जा सके।
यह जलजला केवल ढही हुई इमारतों, टूटे हुए पुलों या सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की चीख और कभी न खत्म होने वाली पीड़ा है, जिन्होंने एक ही झटके में अपना घर, अपना परिवार और अपना सब कुछ खो दिया है। पूरे देश में राहत और बचाव अभियान अभी भी युद्ध स्तर पर जारी है, और सेना तथा गोताखोरों की टीमें मलबे, उफनती नदियों और भूस्खलन वाले खतरनाक क्षेत्रों से लगातार नए शवों को बाहर निकाल रही हैं। अपनों की तलाश में बदहवास लोग राहत शिविरों, अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं, और अब उनकी नम और सूजी हुई आंखें गोकर्ण के उन जंगलों की ओर भी एक अजीब सी हताशा के साथ टिक गई हैं, जहां शायद उनके किसी अपने को एक गुमनाम बॉडी बैग में हमेशा के लिए दफ्न कर दिया गया हो।
नेपाल की धरती पर आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने न केवल अनगिनत हंसते-खेलते परिवारों के भविष्य को हमेशा के लिए अंधकार में धकेल दिया है, बल्कि इसने देश के आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य ढांचे की उस जर्जर हकीकत को भी पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है जो इतने बड़े संकट के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। गोकर्ण के जंगलों में पीपीई किट पहने जवानों द्वारा दफनाए जा रहे वे अनगिनत गुमनाम शव इस बात की खौफनाक गवाही दे रहे हैं कि प्रकृति का प्रकोप कितना अकल्पनीय, क्रूर और विनाशकारी हो सकता है। यह अभूतपूर्व त्रासदी नेपाल के सीने पर एक ऐसा गहरा और रिसता हुआ जख्म छोड़ गई है, जिसकी टीस आने वाली कई पीढ़ियों तक महसूस की जाएगी, और इस बेहिसाब बर्बादी से पूरी तरह उबरने में इस देश को अभी दशकों का लंबा और बेहद पीड़ादायक सफर तय करना होगा।
