यश पांडेय
बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में उस वक्त अचानक जबरदस्त हलचल मच गई, जब राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लेते हुए ‘बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड’ को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया। समाज कल्याण विभाग द्वारा उठाए गए इस बड़े और सख्त कदम ने पूरे प्रदेश के राजनीतिक हलकों को चौंका कर रख दिया है। सरकार द्वारा इस संस्था के खिलाफ की गई त्वरित और कठोर कार्रवाई के मूल में वह अत्यंत विवादित प्रस्ताव है, जिसके तहत देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराने की औपचारिक सिफारिश पारित की गई थी।
इस पूरे विवादित घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब ट्रांसजेंडर समुदाय के सामाजिक उत्थान, पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़ी सरकारी योजनाओं की प्रगति की समीक्षा के लिए किन्नर कल्याण बोर्ड की एक विशेष और आधिकारिक बैठक का आयोजन किया गया था। इस बैठक की पूर्व-निर्धारित कार्यसूची में किन्नर समाज के लिए पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया को तेज करने, पेंशन योजनाओं के विस्तार, शिक्षा, रोजगार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ बनाने जैसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दों पर चर्चा होनी तय थी। हालांकि, बैठक की कार्यवाही के दौरान बोर्ड के कुछ शीर्ष प्रतिनिधियों ने मूल एजेंडे को पूरी तरह दरकिनार करते हुए अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपनी आस्था जताने के नाम पर उनका एक मंदिर स्थापित करने का विचार पटल पर रख दिया, जिसे सदस्यों की सहमति से लिखित प्रस्ताव बनाकर पास कर दिया गया।
जैसे ही किन्नर कल्याण बोर्ड की इस आधिकारिक बैठक की विवरण पुस्तिका और पारित प्रस्ताव की प्रति सार्वजनिक हुई, वैसे ही यह खबर पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गई। एक सरकारी, संवैधानिक और जनकल्याणकारी मंच का इस्तेमाल किसी जीवित राजनीतिक नेता का मंदिर बनाने की सिफारिश पारित करने के लिए किए जाने की बात सामने आते ही हर तरफ गहरा आश्चर्य और आक्रोश व्यक्त किया जाने लगा। मुख्यधारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर खबर के वायरल होते ही आम नागरिकों के साथ-साथ प्रशासनिक महकमे में भी संस्थागत गरिमा, अनुशासन और बोर्ड के अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने शुरू हो गए।
विवादित प्रस्ताव के सार्वजनिक होते ही राज्य के प्रमुख विपक्षी दलों ने बिहार सरकार और समाज कल्याण विभाग के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए चौतरफा हमला बोल दिया। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि जनता के पैसों से चलने वाले सरकारी बोर्ड अब जनकल्याण का काम छोड़कर राजनीतिक चाटुकारिता का केंद्र बनते जा रहे हैं। विपक्ष का स्पष्ट तर्क था कि जिस संस्था का प्राथमिक और एकमात्र दायित्व समाज के सबसे उपेक्षित, वंचित और हाशिए पर खड़े किन्नर समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ना था, वह संस्था अपनी तय जिम्मेदारियों को पूरी तरह भूलकर राजनीतिक और धार्मिक एजेंडे को बढ़ावा देने में जुट गई है।
राजनीतिक दलों के तीखे हमलों और आम जनता के बीच लगातार बढ़ते सार्वजनिक असंतोष की गंभीर स्थिति को देखते हुए बिहार के समाज कल्याण विभाग ने मामले का तुरंत संज्ञान लिया। राज्य सरकार के उच्च स्तर पर आयोजित आपात बैठकों में इस बात पर गहरा असंतोष और नाराजगी व्यक्त की गई कि एक सरकारी निकाय अपनी निर्धारित सीमाओं, नियमावली और प्रशासनिक मर्यादाओं को लांघकर इस प्रकार के अप्रासंगिक फैसले कैसे ले सकता है। इसके तुरंत बाद समाज कल्याण विभाग ने बोर्ड की पूरी कार्यप्रणाली, उसके गठन और विवादित बैठक की पूरी कार्यवाही की विस्तृत जांच के आदेश जारी कर दिए।
गहन जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद समाज कल्याण विभाग ने एक विस्तृत और सख्त अधिसूचना जारी करते हुए किन्नर कल्याण बोर्ड को तुरंत प्रभाव से निरस्त करने का अंतिम फैसला सुनाया। विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आदेश में साफ शब्दों में उल्लेख किया गया कि बोर्ड ने अपनी नियमावली, प्रशासनिक मर्यादाओं और संवैधानिक सीमाओं का गंभीर उल्लंघन किया है। सरकार की ओर से इस कार्रवाई के जरिए यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कल्याणकारी निकायों की स्थापना लक्षित वर्ग के अधिकारों की सुरक्षा और उनके सामाजिक पुनर्वास के लिए होती है, न कि अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे गैर-जरूरी और विवादित प्रस्ताव पास करने के लिए।
राज्य सरकार की इस सख्त कार्रवाई का बिहार के ट्रांसजेंडर समुदाय और उनके अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी खुलकर स्वागत किया है। किन्नर समाज के प्रमुख प्रतिनिधियों का कहना है कि आज भी राज्य में उनका समुदाय पहचान पत्र, सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित आवास और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए रोज संघर्ष कर रहा है। ऐसे अत्यंत गंभीर और बुनियादी मुद्दों को पूरी तरह नजरअंदाज कर पीएम मोदी के मंदिर निर्माण जैसे विचार को प्राथमिकता देना बेहद निराशाजनक था, इसलिए इस निष्प्रभावी बोर्ड को भंग करना पूरी तरह से न्यायसंगत और जरूरी कदम है।
कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक विश्लेषकों ने भी सरकार के इस फैसले को संस्थागत अनुशासन और प्रशासनिक गरिमा बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी सरकारी निकाय को अपने मूल जनादेश से भटककर इस प्रकार के राजनीतिक या धार्मिक प्रस्ताव पास करने की छूट दे दी जाती, तो इससे राज्य के अन्य आयोगों, मंडलों और परिषदों के बीच भी एक गलत नजीर पेश होती। इस त्वरित और कड़े फैसले के जरिए सरकार ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी संस्था या बोर्ड को अपनी तय कार्यसीमा से बाहर जाकर मनमानी करने की अनुमति कदापि नहीं दी जाएगी।
किन्नर कल्याण बोर्ड को निरस्त करने की कार्रवाई पूरी होने के बाद अब बिहार सरकार नए सिरे से इसके पुनर्गठन की विस्तृत रूपरेखा तैयार करने में जुट गई है। समाज कल्याण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, जल्द ही एक पारदर्शी, निष्पक्ष और कड़े नियमों के तहत नए बोर्ड का गठन किया जाएगा। नए बोर्ड में केवल उन्हीं समर्पित व्यक्तियों, समाजसेवियों और ट्रांसजेंडर समुदाय के सच्चे प्रतिनिधियों को जगह दी जाएगी जो राजनीति से पूरी तरह दूर रहकर निष्ठा के साथ किन्नर समाज के सामाजिक उत्थान, आर्थिक सशक्तिकरण, पेंशन और संवैधानिक अधिकारों को धरातल पर उतारने का काम कर सकें।
इस पूरे हाई-प्रोफाइल घटनाक्रम ने बिहार के अन्य सभी सरकारी निकायों, विकास परिषदों, सलाहकार समितियों और राज्य आयोगों के लिए भी एक बड़ा सबक पेश किया है कि वे अपनी तय सीमाओं और संवैधानिक दायरे के भीतर ही कार्य करें। अब राज्य की जनता, सामाजिक संगठनों और विशेष रूप से किन्नर समाज की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार नए बोर्ड का गठन कितनी जल्दी करती है और वह नया निकाय विवादों से दूर रहकर किन्नर समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान और उनके अधिकारों के लिए किस प्रकार ठोस, पारदर्शी और जमीनी कदम उठाता है।
