प्रणव कुमार अभय
जबलपुर की संस्कारधानी के घाटों से आई यह तस्वीर केवल एक मां और बच्चे के निष्प्राण शरीर की नहीं है, बल्कि यह हमारे प्रशासन की मृत हो चुकी संवेदनाओं का प्रतिबिंब है। जब एक मां अपनी आखिरी सांस तक अपने बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है, तो वह दृश्य पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर देता है। लेकिन क्या यह दर्द उन वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारियों तक पहुँचता है, जिनके पास सुरक्षा के नाम पर सिर्फ आश्वासनों का पुलिंदा होता है? भेड़ाघाट और ग्वारीघाट जैसे पर्यटन स्थलों पर हर साल लाखों लोग आते हैं, लेकिन सुरक्षा के इंतज़ामों के नाम पर वहां सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। यह ‘हादसा’ नहीं है, बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई एक सोची-समझी ‘प्रशासनिक हत्या’ है, जहाँ चंद रुपयों के लालच में सुरक्षा मानकों को लहरों में बहा दिया जाता है।
प्रशासन और पर्यटन विभाग से सीधा सवाल है कि आखिर घाटों पर तैनात सुरक्षाकर्मी उस समय कहाँ सो रहे होते हैं जब कोई परिवार लहरों से जंग लड़ रहा होता है? नावों में क्षमता से अधिक पर्यटकों को बिठाना यहाँ की पुरानी बीमारी है, जिसे ठीक करने के बजाय विभाग ‘आँखें मूंदने’ की नीति अपनाता है। जो लाइफ-जैकेट इस तस्वीर में दिखाई दे रहे हैं, क्या उनकी कभी गुणवत्ता जांच (Quality Check) की गई? अक्सर ये जैकेट्स केवल फटे-पुराने और एक्सपायर्ड कपड़े के टुकड़े होते हैं, जो डूबते इंसान को बचाने के बजाय उसे और नीचे खींच लेते हैं। क्या प्रशासन यह स्पष्ट करेगा कि इन घाटों पर ‘रैपिड रिस्पांस टीम’ का गठन क्यों नहीं किया गया, जो संकट के समय तुरंत सक्रिय हो सके?
भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि ठेकेदारों और अधिकारियों का गठजोड़ मौत का व्यापार करने से भी नहीं हिचकता। पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर बड़े-बड़े विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च किए जाते हैं, लेकिन जब बात एक गोताखोर की तैनाती या आधुनिक बचाव उपकरणों की आती है, तो बजट का रोना रोया जाता है। यह सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है कि वह इंसानी जान की कीमत चंद रुपयों के ठेके से कम आंकता है। क्या जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठकर उस मां की चीखें सुन सकते हैं, जिसने डूबते हुए भी अपने बच्चे को बचाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी? जवाबदेही के नाम पर हर बार एक छोटी जांच कमेटी बिठा दी जाती है, जिसकी रिपोर्ट कभी ठंडे बस्ते से बाहर नहीं आती।
सवाल उन कानूनों पर भी है जो केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते हैं। नियम कहते हैं कि बिना लाइफ गार्ड और उचित सुरक्षा उपकरणों के कोई भी नाव पानी में नहीं उतरेगी, लेकिन जबलपुर के घाटों पर नियमों की धज्जियां उड़ाना एक आम बात है। क्या पुलिस और प्रशासन का खौफ इतना खत्म हो चुका है कि नाव संचालक सरेआम सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं? या फिर इस बेखौफ अंदाज के पीछे किसी बड़े रसूखदार का हाथ है? जब तक बड़े अधिकारियों की ‘एसी’ गाड़ियों से उतरकर जमीन पर जवाबदेही तय नहीं होगी और दोषियों पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज नहीं होगा, तब तक ये घाट इसी तरह मासूमों की ‘जल-समाधि’ बनते रहेंगे।
अंत में, यह तस्वीर समाज के लिए एक चेतावनी है। आज किसी और का संसार उजाड़ गया है, कल हमारा भी हो सकता है। यह वक्त सिर्फ आंसू बहाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था के गिरेबान को पकड़कर सवाल पूछने का है। हमें पूछना होगा कि आखिर कब तक मासूमों के शवों पर प्रशासन अपनी नाकामियों को ढकने की कोशिश करेगा? जबलपुर की जनता और देश के जागरूक नागरिकों को अब मौन तोड़ना होगा। सुरक्षा कोई खैरात नहीं है जो प्रशासन हमें दे रहा है, यह हमारा संवैधानिक अधिकार है। अगर आज हमने सिस्टम को नहीं जगाया, तो अगली बार फिर किसी अखबार के पन्ने पर ऐसी ही एक रूह कंपा देने वाली तस्वीर छपेगी और हम फिर से वही खोखली शोक-संवेदनाएं व्यक्त कर रहे होंगे।
